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Sunday, October 1, 2017

महाराणा प्रताप सिंह जी राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।

नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी)
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान
पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.
पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शासन अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह
अन्य जानकारी -
महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,
जिसका नाम 'चेतक' था।
राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर,
मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि
राणा प्रताप का जन्म हुआ।
महाराणा का नाम
इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है।
महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर
के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती
है।
महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-
1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने
अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि
हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़
प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |
3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान
उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|
लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और
अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| इसी
समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है|
मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |
10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे
जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे|
आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील |
13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |
14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी
की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|
15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया
हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और
महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।
महाराणा प्रताप के हाथी
की कहानी:
मित्रो आप सब ने महाराणा
प्रताप के घोड़े चेतक के बारे
में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी
भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख
अल- बदायुनी, जो मुगलों
की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।
वो लिखता है की जब महाराणा
प्रताप पर अकबर ने चढाई की
थी तब उसने दो चीजो को
ही बंदी बनाने की मांग की
थी एक तो खुद महाराणा
और दूसरा उनका हाथी
रामप्रसाद।
आगे अल बदायुनी लिखता है
की वो हाथी इतना समझदार
व ताकतवर था की उसने
हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही
अकबर के 13 हाथियों को मार
गिराया था
वो आगे लिखता है कि
उस हाथी को पकड़ने के लिए
हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर
14 महावतो को बिठाया तब
कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।
अब सुनिए एक भारतीय
जानवर की स्वामी भक्ति।
उस हाथी को अकबर के समक्ष
पेश किया गया जहा अकबर ने
उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने
और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने
18 दिन तक मुगलों का न
तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद
हो गया।
तब अकबर ने कहा था कि
जिसके हाथी को मैं अपने सामने
नहीं झुका पाया उस महाराणा
प्रताप को क्या झुका पाउँगा।
ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ
जानवर थे।
पढ़कर सीना चौड़ा हुआ हो
तो शेयर कर देना।

बक्त पड़नेपर वो शेर से भी भिड़ जाये..

एक बार ‪‎औरंगजेब‬ के दरबार में एक शिकारी जंगल से
पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया ! लोहे के पिंजरे में
बंद शेर बार-बार दहाड़ रहा था ! बादशाह कहता
था… इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल
सकता ! दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलायी.. किन्तु वहाँ
मौजूद राजा यसवंत सिंह जी ने कहा – इससे भी
अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है ! क्रूर एवं
अधर्मी औरंगजेब को बड़ा क्रोध हुआ ! उसने कहा
तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो.. यदि
तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट लिया
जायेगा …… !
दुसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला
देखने बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी ! औरंगजेब
बादशाह भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर
बैठ गया ! राजा यशवंत सिंह अपने दस वर्ष के
पुत्र पृथ्वी सिंह के साथ आये ! उन्हें देखकर
बादशाह ने पूछा– आपका शेर कहाँ है ? यशवंत सिंह
बोले- मैं अपना शेर अपने साथ लाया हूँ ! आप केवल
लडाई की आज्ञा दीजिये !
बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े
पिंजड़े में छोड़ दिया गया ! यशवंत सिंह ने अपने
पुत्र को उस पिंजड़े में घुस जाने को कहा ! बादशाह
एवं वहां के लोग हक्के-बक्के रह गए ! किन्तु दस
वर्ष का निर्भीक बालक पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम
करके हँसते-हँसते शेर के पिंजड़े में घुस गया ! शेर ने
पृथ्वी सिंह की ओर देखा ! उस तेजस्वी बालक के
नेत्रों में देखते ही एकबार तो वह पूंछ दबाकर पीछे
हट गया.. लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले की
नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर
पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा ! वार बचा कर वीर बालक
एक ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली ! पुत्र को
तलवार निकालते हुए देखकर यशवंत सिंह ने पुकारा –
बेटा, तू यह क्या करता है ? शेर के पास तलवार है
क्या जो तू उसपर तलवार चलाएगा ? यह हमारे
हिन्दू-धर्म की शिक्षाओं के विपरीत है और
धर्मयुद्ध नहीं है !
पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी
और निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा ! अंतहीन से दिखने
वाले एक लम्बे संघर्ष के बाद आख़िरकार उस छोटे
से बालक ने शेर का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया और
फिर पूरे शरीर को चीर दो टुकड़े कर फेंक दिया ! भीड़
उस वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय-जयकार करने
लगी ! अपने.. और शेर के खून से लथपथ पृथ्वी
सिंह जब पिंजड़े से बाहर निकला तो पिता ने दौड़कर
अपने पुत्र को छाती से लगा लिया !
तो ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे.. जिनके मुख-
मंडल वीरता के ओज़ से ओतप्रोत रहते थे !
और आज हम क्या बना रहे हैं अपनी संतति को..
सारेगामा लिट्ल चैंप्स के नचनिये.. ?
आज समय फिर से मुड़ कर इतिहास के उसी
औरंगजेबी काल की ओर ताक रहा है.. हमें चेतावनी
देता हुआ सा.. कि ज़रुरत है कि हिन्दू अपने बच्चों
को फिर से वही हिन्दू संस्कार दें.. ताकि बक्त पड़ने
पर वो शेर से भी भिड़ जाये.. न कि “सुवरों” की
तरह चिड़ियाघर के पालतू शेर के आगे भी हाथ पैर
जोड़ें.. !

सम्राट अशोक का शासनकाल.

304 ईसापूर्व से 232 ईसापूर्व तक अखंड भारत के राजा रह चुके सम्राट अशोक के बारे में कई ऐसी जानकारियाँ आज भी लोगों को ज्ञात नहीं हैं, जो रहस्य से भरी हैं.
अखंड भारत की स्थापना करने वाले प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र और सम्राट बिंदुसार के दुसरे पुत्र अशोक ही मौर्य वंश के आखरी शासक हुए.
इतिहास की बात करे तो गुप्तवंश या जिसे मौर्यवंश भी कहते हैं भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य हुआ.
मौर्यवंश के दौरान ही भारत अपने स्वर्णिम दौर में था और जब सम्राट अशोक ने राज्य संभाला तो भारत उस वक्त दुनिया का सबसे समृद्ध देश हुआ करता था.
सम्राट बिन्दुसार और रानी सुभ्द्रांगी के पुत्र अशोक को अपने सम्राट बनने के मार्ग में खुद के भाइयों से कई युद्ध करने पड़े थे, लेकिन सम्राट अशोक के शासन ने ही भारत को विश्वशक्ति के रूपमें प्रस्तुत कर दिया था.
सम्राट अशोक को देवनाप्रिय भी कहा जाता था.
इस शब्द का सही अर्थ देवों का अप्रिय होने वाला होता हैं.
सम्राट अशोक को पुरे भारतीय इतिहास में सबसे हिंसक राजा माना जाता हैं इसलिए उन्हें देवनाप्रिय कहा जाने लगा.
लेकिन कलिंग में हुए सबसे क्रूर युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने अहिंसा की ओर कदम बढ़ा कर बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए थे.
अपने शासन काल में सम्राट अशोक ने ऐसे कई नए कार्य किये जो काफीरहस्यमयी रहे, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को ही हैं.
आईएं जानते हैं सम्राट अशोक के कुछ रहस्य-
1. नौ रत्न-
कहते हैं कि सम्राट अशोक ने ही अपनी सभा में नौ रत्न रखने की परंपरा की शुरुआत की थी, जिसका पालन आगे कई राजा भी करने लगे.
सबसे प्रसिद्ध मुग़ल राजा अकबर ने सम्राट अशोक की कई नीतियों को अपने शासनकाल में अपनाया था.
नौ रत्न की इस परंपरा में रहने वाले लोग कई तरह के विचारक और विद्वान हुआ करते थे, जो राजा को सुशासन के लिए मार्गदर्शन करते थे लेकिन वे सभी नौ लोग पूरी तरहसे गुप्त होते थे.
2. ज्ञान से भरपूर गुप्त किताब-
सम्राट अशोक अपने शासनकाल में नौ रत्नों से मिली हर तरह की जानकारी या ज्ञान को एक पुस्तक में दर्ज़ करवा लेते थे ताकि आगे यदि आवश्यकता पड़ने पर उस ज्ञान का इस्तेमाल किया जा सके. लेकिन वह पुस्तक भी हर किसी पहुच से दूर थी.
3. नौ रत्नों की शक्ति-
सम्राट अशोक द्वारा बनाये गए नौ रत्नों का यह समूह पूरी दुनिया में सबसे शक्तिशाली समूह था.
इसमें उपस्थित नौ व्यक्ति के आगे दुनिया का कोई भी व्यक्ति, राज्य या देश टिक नहीं पाता था.
4. मृत्यु का रहस्य-
सम्राट अशोक की मृत्यु कैसे हुई और कहा हुई यह बात अभी तक एक रहस्य के रूप में दबी हुई हैं.
कई इतिहासकार के अनुसार सम्राट की मृत्यु तक्षशिला में हुई, वही कई का कहना हैं कि सम्राट अशोक पाटलीपुत्र में अपनी अंतिम सांस लिए थे.
5.स्वर्णिम दौर-
अर्थशास्त्री कहते हैं कि सम्राट अशोक के शासन के दौरान भारत कीअर्थ व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में 35% की भागीदारी रखती थी.
लेकिन सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद भारत का पतन शुरू हुआ और मुग़ल एवं अग्रेज़ों के समय तक 1947 में मात्र 4% तक रह गयी.
6.जातिवाद-
सम्राट अशोक के सुशासन और उनकी ऊँची सोच के चलते ही उनके शासनकाल में जातिवाद जैसी कोई प्रथा नहीं थी.
शासन की दृष्टि में सभी कोई एकसमान थे.
7. सबसे युवा सम्राट-
इतिहास के अनुसार सम्राट अशोक का शासनकाल लगभग 40वर्ष से भी अधिक का था, इस हिसाब से वह बहुत कम उम्र में राजा बने थे.
हालांकि सम्राट अशोक के दादा सम्राट चन्द्रगुप्त मोर्य भी बहुत कम उम्र में राजा बन गए थे लेकिन अखंड भारत का सम्राट बनने में उन्हें कुछ समय लगा था.
वही अशोक जब सम्राट बने तब वह युवक ही थे इसलिए वह सबसे युवा सम्राट कह लायें.
इतिहास में ऐसे कई रहस्य है जो भारत में बाहर से आये आक्रान्ताओं ने बदल दिए लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता हैं कि भारत का वह दौर स्वर्णिम दौर था.
मौर्यवंश और सम्राट अशोक का दौर ही ऐसा दौर था जब भारत सचमुच में “सोने की चिड़िया” कहलाया था.


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